
सम्पूर्ण पवित्रता का फल
𝐏𝐨𝐞𝐭: BK Mukesh Modi
नाश न कर तू खुद का, भोगकर विषय विकार
पवित्रता अपनाकर तू, कर ले स्वयं पर उपकार
रोग हजारों पाएगा तू, विकार अगर अपनाएगा
दुखी होकर जीएगा तू, दुखी होकर मर जाएगा
तन मन की दुर्बलता, विकारों से तुझ में आएगी
तेरी ख़ुशनुमा ज़िन्दगी, नरक समान बन जाएगी
हिम्मत न बचेगी तुझमें, न रहेगा आत्मविश्वास
बरबाद करेगी पूरा तुझे, विकारों की मीठी प्यास
अनेक उलझनों में खुद को, रोज फंसाता जाएगा
करना चाहेगा बहुत कुछ, लेकिन कर न पाएगा
पवित्रता की धारणा से, मनोबल तुझमें आएगा
जो कुछ चाहता है जीवन में, वो सब तू पाएगा
बड़ी कठोर और मजबूत है, विकारों की चट्टानें
आत्मस्मृति के हथौड़े, इन पर होंगे तुझे लगाने
प्रहार इन पर करता जा, तू निरन्तर और भरपूर
कर दे इन पांचों विकारों को, पूरा ही चकनाचूर
खुद को रोज पिलाता चल, तू पवित्रता की घुट्टी
प्रभु स्मृति से मत लेना, एक पल की भी छुट्टी
एक पल का अलबेलापन, तुझे धोखा दे जाएगा
तेरा सारा पुरुषार्थ फिर से, शून्य पर आ जाएगा
खुद में जलाकर रखना, प्रचण्ड योग की ज्वाला
केवल यही अभ्यास तुझको, पवित्र बनाने वाला
दैहिक आकर्षण से जब, तू पूरा मुक्त हो जाएगा
अपने आत्म स्वरूप का, सबको दर्शन दे पाएगा
तुझे देखकर जब कोई, खुद को पावन बनाएगा
तब ही सम्पूर्ण पवित्रता की, श्रेष्ठ मंजिल पाएगा
यही सम्पूर्ण पवित्रता, तुझको फरिश्ता बनाएगी
दुखों से मुक्ति दिलाकर, तुझे स्वर्ग में पहुंचायेगी ||
" ॐ शांति "
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