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मन की उड़ान

𝐏𝐨𝐞𝐭: BK Mukesh Modi

अपने मन को जब भी देखा
उड़ता पंछी मुझे नजर आया

उड़ान थी इसकी इतनी ऊँची
कभी इसे मैं पकड़ न पाया

कहाँ कहाँ मेरा मन जाता था
बुद्धि को इसके पीछे दौड़ाया

असंख्य विचारों की डालियाँ
पकड़ता हुआ इसको पाया

टिकता नहीं था एक जगह पे
उछलता रहता बन्दर समान

प्रयास कर लिए हजारों मैंने
लगा न वश करना आसान

अपनी मर्जी का यह घोड़ा
रोके कभी नहीं रुकता था

कितने भी कानून लगाओ
फिर भी नहीं ये झुकता था

मन की मर्जी का मर्ज मिटाने
परमपिता परमात्मा आया

उसने ही तो आकर मन को
वश करने का उपाय बताया

सबसे पहले मन को अपनी
विशेषताएँ याद दिलाओ

उड़ान तेरी है पार गगन के
बड़े प्यार से इसे समझाओ

काहे को तूँ भटकता रहता
गलियों में व्यर्थ विचारों की

प्रभु की मत अपनाकर तू
मंज़िल पाएगा बहारों की

सोचकर देख कैसा होगा
स्वर्णिम दुनिया का नजारा

जहाँ पर होगा सुख ही सुख
सारे कल्प में वो सबसे प्यारा

ऐसा सुखमय प्यारा संसार
किसलिए तुझको नहीं भाता

क्यों तू अपने आपको इतना
व्यर्थ की बातों में भटकाता

छोड़कर व्यर्थ की बातें सारी
ईश्वरीय शिक्षाओं को मान

व्यर्थ के सारे फंदे काटकर
भर ले गगन के पार उड़ान

मन बुद्धि को शुद्ध बना ले
करके आत्म रूप को याद

हो जाएगा पल भर में तू
व्यर्थ की बातों से आजाद

व्यर्थ से आजाद होकर ही
तू प्यार प्रभु का पाएगा

खुद को पावन बनाकर ही
तू स्वर्ग धरा पर लायेगा ||
" ॐ शांति "

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