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- ज्ञान, योग, धारणा, सेवा में पुरुषार्थ की विधि
❣⚜❣⚜❣⚜❣⚜❣⚜❣ आज बाबा ने ब्रह्माकुमार सूरज भाई जी द्वारा बहुत ही लाभदायक क्लास कराई इस में बाबा ने 16 अभ्यास बताएं जिसके अभ्यास से आत्मा शक्तिशाली बन जाती है। Today Baba gave a gift of points of Shrimat for Purusharth in our Four main subjects - Gyan, Yog, Dharna and Sewa. Here is the point wise notes. Do write down all points in your notebook or print it. (Also refer to page: Four Subjects) To view, download or print this, visit PDF version. इसके छोटे छोटे अभ्यास से बड़े अभ्यास बन जाते हैं बस लयबद्ध से अभ्यास करने से मन में शक्ति भरती हैं। * ज्ञान के 5 प्वांइट * 1) मुरली को मनन जरूर जरूर करना है कि क्योंकि ज्ञान प्रकाश अनुभूति है। 2) मुरली को समझना है एक एक वाक्य पर घ्यान देना है पहले समझना होगा फिर आगे बढना है गुह्यी अर्थ को समझना होगा। 3) मुरली का वरदान या स्लोगन बच्चों की तरह रट लेना है फिर पुरा दिन याद करते करते अपने में समाना है। 4) बार बार पढ़कर फिर रिवाइज करना है पक्का पाठ याद करना है। 5) मुरली को कम से कम 2 बार पढ़ना है एक बार सुनना सुनने से कुछ बाते निकल जाती है। * योग की 4 प्वांइट * 1) बाबा को बड़े प्यार बार बार बुलाना उनका आव्हान करना बाबा को अधिकार से बड़े प्यार बुलाओ बाबा आ जाओ । 2) अमृत वेला ब्राह्मणों का फाउंडेशन है कभी मिस नहीं करना है रात को जल्दी सो जाना चाहिए। 3) बाबा को बार बार बड़े दिल से भाव से शुक्रिया कहना है शुक्रिया बाबा । 4 अटेंशन स्वय पर रखना है दूसरों को नहीं देखना है समय के महत्व को जान अपना पुरूषार्थ करना है। * धारणा के प्वाइंट * 1) डिजिटल वर्ल्ड से दूर रहना है यही माया का प्रवेश द्वार है इसे केवल ज्ञान व सेवा प्रति प्रयोग करना है। 2) झगमूई झरमूई से दूर रहना है असत्य बात न सुन्नी है ना हि फैलानी है। 3) एकांत में जरूर बैठना है मौन में रहकर कर बाबा को याद करना है अंर्तमुखी बनना है। * सेवा के प्वांइट * 1) सेवा में संकल्प बोल की इकोनामी करनी है साथ साथ भोजन पानी बिजली स्थूल धन की भी इकोनामी करनी है। 2) अपनी विशेषता को बढ़ाना है कुछ न कुछ नया सीख कर उसे सेवा में लगाना है। 3) सेवा में नवीनता लानी है एक जैसी नहीं करनी है जितनी नवीनता होगी तो खुशी भी रहेगी । 4) सेवा श्रीमत अनुसार करनी है आत्म अभिमानी स्थिति में करनी है परमात्मा की याद सारा टाइम बनी रहे स्वमान की सीट पर सेट होकर करनी है अपना तन मन धन सब सेवा में लगाना है सम्पूर्ण समर्पण सेवा निस्वार्थ निष्काम करनी है कोई इच्छा नहीं करनी है कोई वर्णन नहीं । * शुक्रिया बाबा शुक्रिया * ~~~~ Useful links ~~~~ PDF version of this Article Revelations from Gyan Murli Four Subjects of BK Resources - Total collection Explore the Sitemap BK Articles Blog . #brahmakumari #brahmakumaris #Hindi
- 27 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today Murli Poem)
Hindi Poem from today's murli. Aaj ki gyan murli se ek Kavita 27 Feb 2019. This poem is daily written on day's murli by Brahma Kumar (BK) Mukesh (from Rajasthan). To read more Hindi poems written, visit Murli Poems page. * मुरली कविता दिनांक 27.2.2019 * याद का चार्ट तुम्हारे पुरुषार्थ की गति बताएगा देहभान पीछे करेगा आत्मभान आगे बढ़ाएगा सतयुगी सुख का मोल जिसे समझ में आएगा वही बच्चा सतयुग में शुरू के जन्मों में आएगा स्वर्ग का वर्सा देने वाले की सबको दो पहचान निराकार वो ज्योति बिन्दु अपना शिव भगवान पुरुषार्थ में थककर बच्चे कितनी रड़ियाँ मारते आत्मभान की स्थिति से खुद को नीचे उतारते अति सरल सीधा ज्ञान हम सबको बाप सुनाते बाप को याद ना कर बच्चे मुश्किल इसे बनाते केवल मनुष्य मत ही सबको दुर्गति में ले जाती ईश्वरीय मत फिर से बच्चों को सद्गति दिलाती शरीर निर्वाह अर्थ बच्चों कर्म जरूर तुम करना किंतू बाप को भूलने की गलती कभी ना करना दुनिया के झंझटों में कभी खुद को ना फंसाना मनुष्य मत को छोड़कर बाप की मत अपनाना एक बाप से प्यार रखकर उसकी महिमा गाना बाकी सभी देहधारियों से मोह को तुम मिटाना नॉलेज की शक्ति से हर गलत को सही बनाओ परिवर्तन के बल से ज्ञानी तू आत्मा कहलाओ व्यर्थ और गलत संकल्पों के वश में नहीं आना ज्ञान प्रकाश के बल से अज्ञान अंधेरा मिटाना शुभ चिन्तन करते हुए शुभ चिन्तक बन जाओ व्यर्थ चिन्तन करने की आदत जड़ से मिटाओ *ॐ शांति* ---- Useful links ---- Online Services (all listed) Resources - Divine collection BK Google - A divine search engine for BKs Brahma Kumaris Website links Videos Gallery - YouTube playlist Follow our Main Blog . #Murli #brahmakumari #Hindi #brahmakumaris
- 26 Feb 2019 आज की मुरली BK murli in Hindi
Brahma Kumaris murli today in Hindi Aaj ki murli Madhuban 26-02-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन "मीठे बच्चे - इस शरीर से जीते जी मरने के लिए अभ्यास करो - 'मैं भी आत्मा, तुम भी आत्मा' - इस अभ्यास से ममत्व निकल जायेगा'' प्रश्नः- सबसे ऊंची मंज़िल कौन-सी है? उस मंज़िल को प्राप्त करने वालों की निशानी क्या होगी? उत्तर:- सभी देहधारियों से ममत्व टूट जाए, सदा भाई-भाई की स्मृति रहे - यही है ऊंची मंज़िल। इस मंज़िल पर वही पहुँच सकते हैं जो निरन्तर देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करते हैं। अगर देही-अभिमानी नहीं तो कहीं न कहीं फँसते रहेंगे या अपने शरीर में या किसी न किसी मित्र सम्बन्धी के शरीर में। उन्हें कोई की बात अच्छी लगेगी या कोई का शरीर अच्छा लगेगा। ऊंची मंज़िल पर पहुँ-चने वाले जिस्म (देह) से प्यार कर नहीं सकते। उनका शरीर का भान टूटा हुआ होगा। ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को कहते हैं - देखो, मैं तुम सभी बच्चों को आपसमान बनाने आया हूँ। अब बाप आप समान बनाने कैसे आयेंगे? वह है निराकार, कहते हैं मैं निराकार हूँ तुम बच्चों को आपसमान अर्थात् निराकारी बनाने, जीते जी मरना सिखलाने आया हूँ। बाप अपने को भी आत्मा समझते हैं ना। इस शरीर का भान नहीं है। शरीर में रहते हुए भी शरीर का भान नहीं है। यह शरीर उनका तो नहीं है ना। तुम बच्चे भी इस शरीर का भान निकाल दो। तुम आत्माओं को ही मेरे साथ चलना है। यह शरीर जैसे मैंने लोन लिया है, वैसे आत्मायें भी लोन लेती हैं पार्ट बजाने लिए। तुम जन्म-जन्मान्तर शरीर लेते आये हो। अब जैसे मैं जीते जी इस शरीर में हूँ परन्तु हूँ तो न्यारा अर्थात् मरा हुआ। मरना शरीर छोड़ने को कहा जाता है। तुमको भी जीते जी इस शरीर से मरना है। मैं भी आत्मा, तुम भी आत्मा। तुमको भी मेरे साथ चलना है या यहाँ ही बैठना है? तुम्हारा इस शरीर में जन्म-जन्मान्तर का मोह है। जैसे मैं अशरीरी हूँ, तुम भी जीते जी अपने को अशरीरी समझो। हमको अब बाबा के साथ जाना है। जैसे बाबा का यह पुराना शरीर है, तुम आत्माओं का भी यह पुराना शरीर है। पुरानी जुत्ती को छोड़ना है। जैसे मेरा इसमें ममत्व नहीं है, तुम भी इस पुरानी जुत्ती से ममत्व निकालो। तुमको ममत्व रखने की आदत पड़ी हुई है। हमको आदत नहीं है। मैं जीते जी मरा हुआ हूँ। तुमको भी जीते जी मरना है। मेरे साथ चलना है तो अब यह प्रैक्टिस करो। शरीर का कितना भान रहता है, बात मत पूछो! शरीर रोगी हो जाता है तो भी आत्मा उसको छोड़ती नहीं है, इससे ममत्व निकालना पड़े। हमको तो बाबा के साथ जाना जरूर है। अपने को शरीर से न्यारा समझना है। इसको ही जीते जी मरना कहा जाता है। अपना घर ही याद रहता है। तुम जन्म-जन्मान्तर से इस शरीर में रहते आये हो इसलिए तुमको मेहनत करनी पड़ती है। जीते जी मरना पड़ता है। मैं तो इसमें आता ही टैप्रेरी हूँ। तो मरकर चलने से अर्थात् अपने को आत्मा समझकर चलने से कोई भी देहधारी में ममत्व नहीं रहेगा। अक्सर करके किसी न किसी का किसी में मोह हो जाता है। बस, उनको देखने बिगर रह नहीं सकते। यह देहधारी की याद एकदम उड़ा देनी चाहिए क्योंकि बहुत बड़ी मंज़िल है। खाते-पीते जैसेकि इस शरीर में हूँ ही नहीं। यह अवस्था पक्की करनी है तब 8 रत्नों की माला में आ सकते हैं। मेहनत बिगर थोड़ेही ऊंच पद मिल सकता है। जीते जी देखते हुए समझें कि मैं तो वहाँ का रहने वाला हूँ। जैसे बाबा इसमें टैप्रेरी बैठा है, ऐसे अब हमको भी घर जाना है। जैसे बाबा का ममत्व नहीं है, वैसे हमको भी इसमें ममत्व नहीं रखना है। बाप को तो इस शरीर में बैठना पड़ता है, तुम बच्चों को समझाने लिए।तुमको अब वापिस चलना है इसलिए कोई देहधारी में ममत्व न रहे। यह फलानी बहुत अच्छी है, मीठी है - आत्मा की बुद्धि जाती है ना। बाप कहते हैं शरीर को नहीं, आत्मा को देखना है। शरीर को देखने से तुम फँस मरेंगे। बड़ी मंज़िल है। तुम्हारा भी जन्म-जन्मान्तर का पुराना ममत्व है। बाबा का ममत्व नहीं है तब तो तुम बच्चों को सिखलाने आया हूँ। बाप खुद कहते हैं मैं तो इस शरीर में नहीं फँसता हूँ, तुम फँसे हुए हो। मैं तुमको छुड़ाने आया हूँ। तुम्हारे 84 जन्म पूरे हुए, अब शरीर से भान निकालो। देही-अभिमानी होकर न रहने से तुम कहीं न कहीं फँसते रहेंगे। कोई की बात अच्छी लगेगी, कोई का शरीर अच्छा लगेगा, तो घर में भी उनकी याद आती रहेगी। जिस्म पर प्यार होगा तो हार खा लेंगे। ऐसे बहुत खराब हो जाते हैं। बाप कहते हैं स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध छोड़ अपने को आत्मा समझो। यह भी आत्मा, हम भी आत्मा। आत्मा समझते-समझते शरीर का भान निकलता जायेगा। बाप की याद से ही विकर्म भी विनाश होंगे। इस बात पर तुम अच्छी तरह से विचार सागर मंथन कर सकते हो। विचार सागर मंथन करने बिगर तुम उछल नहीं सकेंगे। यह पक्का होना चाहिए कि हमको बाप के पास जाना है जरूर। मूल बात है याद की। 84 का चक्र पूरा हुआ फिर शुरू होना है। इस पुरानी देह से ममत्व नहीं हटाया तो फँस पड़ेंगे या अपने शरीर में या कोई मित्र-सम्बन्धी के शरीर में। तुमको तो किससे भी दिल नहीं लगानी है। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है। हम आत्मा भी निराकार, बाप भी निराकार, आधा-कल्प तुम भक्ति मार्ग में बाप को याद करते आये हो ना। 'हे प्रभू' कहने से शिवलिंग ही सामने आयेगा। कोई देहधारी को 'हे प्रभू' कह न सके। सभी शिव के मन्दिर में जाते हैं, उनको ही परमात्मा समझ पूजते हैं। ऊंचे से ऊंचा भगवान् एक ही है। ऊंचे से ऊंचा अर्थात् परमधाम में रहने वाला। भक्ति भी पहले अव्यभिचारी होती है एक की। फिर व्यभिचारी बन जाती है। तो बाप बार-बार बच्चों को समझाते हैं कि तुमको ऊंच पद पाना है तो यह प्रैक्टिस करो। देह का भान छोड़ो। सन्यासी भी विकारों को छोड़ते हैं ना। आगे तो सतोप्रधान थे अभी तो वह भी तमोप्रधान बन पड़े हैं। सतोप्रधान आत्मा कशिश करती है, अपवित्र आत्माओं को खींचती है क्योंकि आत्मा पवित्र है। भल पुनर्जन्म में आते हैं तो भी पवित्र होने के कारण खींचते हैं। कितने उन्हों के फालोअर्स बनते हैं। जितनी पवित्रता की जास्ती ताकत, उतने ज्यादा फालोअर्स। यह बाप तो है ही एवरप्योर और है भी गुप्त। डबल है ना, त़ाकत सारी उनकी है। इनकी (ब्रह्मा की) नहीं। शुरू में भी तुमको उसने कशिश की। इस ब्रह्मा ने नहीं क्योंकि वह तो एवरप्योर है। तुम कोई इनके पिछाड़ी नहीं भागे। यह कहते हैं मैं तो सबसे जास्ती पूरे 84 जन्म प्रवृत्ति मार्ग में रहा। यह तो तुमको खींच न सके। बाप कहते हैं मैंने तुमको खींचा। भल सन्यासी पवित्र रहते हैं। परन्तु मेरे जैसा पवित्र तो कोई भी होगा नहीं। वह तो सब भक्ति मार्ग के शास्त्र आदि सुनाते हैं। मैं आकर तुमको सब वेदों शास्त्रों का सार सुनाता हूँ। चित्र में भी दिखाया है विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला फिर ब्रह्मा के हाथ में शास्त्र दिखाये हैं। अब विष्णु तो ब्रह्मा द्वारा शास्त्रों का सार सुनाते नहीं हैं। वो तो विष्णु को भी भगवान् समझ लेते हैं। बाप समझाते हैं मैं इन ब्रह्मा द्वारा सुनाता हूँ। मैं विष्णु द्वारा थोड़ेही समझाता हूँ। कहाँ ब्रह्मा, कहाँ विष्णु। ब्रह्मा सो विष्णु बनते हैं फिर 84 जन्म के बाद यह संगम होगा। यह तो नई बातें हैं ना। कितनी वन्डरफुल बातें हैं समझाने की।अब तो बाप कहते हैं - बच्चे, जीते जी मरना है। तुम शरीर में जीते हो ना। समझते हो हम आत्मा हैं, हम बाबा के साथ चले जायेंगे। यह शरीर आदि कुछ भी ले नहीं जाना है। अब बाबा आया है, कुछ तो नई दुनिया में ट्रांसफर कर दें। मनुष्य दान-पुण्य आदि करते हैं दूसरे जन्म में पाने के लिए। तुमको भी नई दुनिया में मिलना है। यह भी करेंगे वही जिन्होंने कल्प पहले किया होगा। कम जास्ती कुछ भी होगा नहीं। तुम साक्षी होकर देखते रहेंगे। कुछ कहने की भी दरकार नहीं रहती। फिर भी बाप समझाते हैं जो कुछ करते हैं तो उसका भी अहंकार नहीं आना चाहिए। हम आत्मा यह शरीर छोड़कर जायेंगे। वहाँ नई दुनिया में जाकर नया शरीर लेंगे। गाया भी जाता है राम गयो रावण गयो..... रावण का परिवार कितना बड़ा है। तुम तो मुट्ठी भर हो। यह सारा रावण सम्प्रदाय है। तुम्हारा राम सम्प्रदाय कितना थोड़ा होगा - 9 लाख। तुम धरनी के सितारे हो ना। माँ-बाप और तुम बच्चे। तो बाप बार-बार बच्चों को समझाते हैं कि मरजीवा बनने की कोशिश करो। अगर किसको देखकर बुद्धि में आता है - यह बहुत अच्छी है, बहुत मीठा समझाती है, यह भी माया का वार होता है, माया ललचा देती है। उनकी तकदीर में नहीं है तो माया सामने आ जाती है। कितना भी समझाओ तो गुस्सा लगेगा। यह नहीं समझते हैं कि यह देह-अभिमान ही काम करा रहा है। अगर ज्यादा समझाते हैं तो टूट पड़ते हैं इसलिए प्यार से चलाना पड़ता है। किससे दिल लग जाता है तो बात मत पूछो, पागल हो जाते हैं। माया एकदम बेसमझ बना देती है इसलिए बाप कहते हैं कभी कोई के नाम-रूप में नहीं फँसना। मैं आत्मा हूँ और एक बाप जो विदेही है, उनसे ही प्यार रखना है। यही मेहनत है। कोई भी देह में ममत्व न हो। ऐसे नहीं, घर में बैठे भी वह ज्ञान देने वाली याद आती रहे - बड़ी मीठी है, बहुत अच्छा समझाती है। अरे, मीठा तो ज्ञान है। मीठी आत्मा है। शरीर थोड़ेही मीठा है। बात करने वाली भी आत्मा है। कभी भी शरीर पर आशिक नहीं होना है।आजकल तो भक्ति मार्ग बहुत है। आनन्दमई माँ को भी माँ-माँ करते याद करते रहते हैं। अच्छा, बाप कहाँ है? वर्सा बाप से मिलना है या माँ से? माँ को भी पैसा कहाँ से मिलेगा? सिर्फ माँ-माँ कहने से जरा भी पाप नहीं कटेंगे। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। नाम रूप में नहीं फँसना है, और ही पाप हो जायेगा क्योंकि बाप का ऩाफरमानबरदार बनते हो। बहुत बच्चे भूले हुए हैं। बाप समझाते हैं मैं तुम बच्चों को लेने आया हूँ सो जरूर ले जाऊंगा, इसलिए मेरे को याद करो। एक मुझे याद करने से ही तुम्हारे पाप कटेंगे। भक्ति मार्ग में बहुतों को याद करते आये हो। परन्तु बाप बिगर कोई काम कैसे होगा। बाप थोड़ेही कहते हैं माँ को याद करो। बाप तो कहते हैं मुझे याद करो। पतित-पावन मैं हूँ। बाप के डायरेक्शन पर चलो। तुम भी बाप के डायरेक्शन पर औरों को समझाते रहो। तुम थोड़ेही पतित-पावन ठहरे। याद एक को ही करना है। हमारा तो एक बाप, दूसरा न कोई। बाबा हम आप पर ही वारी जायेंगे। वारी जाना तो शिवबाबा पर ही है और सबकी याद छूट जानी चाहिए। भक्ति मार्ग में तो बहुतों को याद करते रहते हैं। यहाँ तो एक शिवबाबा, दूसरा न कोई। फिर भी कोई अपनी चलाते हैं तो क्या गति-सद्गति होगी! मूँझ पड़ते हैं - बिन्दी को कैसे याद करें? अरे, तुमको अपनी आत्मा याद है ना कि मैं आत्मा हूँ। वह भी बिन्दी रूप ही है। तो तुम्हारा बाप भी बिन्दी है। बाप से वर्सा मिलता है। माँ तो फिर भी देह-धारी हो जाती है। तुमको विदेही से ही वर्सा मिलना है इसलिए और सब बातें छोड़ एक से बुद्धियोग लगाना है। अच्छा! मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार:- 1) शरीर का भान खत्म करने के लिए चलते-फिरते अभ्यास करना है-जैसे कि इस शरीर से मरे हुए हैं, न्यारे हैं। शरीर में हैं ही नहीं। बिगर शरीर आत्मा को देखो। 2) कभी भी किसी के शरीर पर तुम्हें आशिक नहीं होना है। एक विदेही बाप से ही प्यार रखना है। एक से ही बुद्धियोग लगाना है। वरदान:- ब्राह्मण जीवन में सर्व खजानों को सफल कर सदा प्राप्ति सम्पन्न बनने वाले सन्तुष्टमणि भव ब्राह्मण जीवन का सबसे बड़े से बड़ा खजाना है सन्तुष्ट रहना। जहाँ सर्व प्राप्तियां हैं वहाँ सन्तुष्टता है और जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ सब कुछ है। जो सन्तुष्टता के रत्न हैं वह सब प्राप्ति स्वरूप हैं, उनका गीत है पाना था वह पा लिया... ऐसे सर्व प्राप्ति सम्पन्न बनने की विधि है - मिले हुए सर्व खजानों को यूज़ करना क्योंकि जितना सफल करेंगे उतना खजाने बढ़ते जायेंगे। स्लोगन:- होलीहंस उन्हें कहा जाता जो सदा अच्छाई रूपी मोती ही चुगते हैं, अवगुण रूपी कंकड़ नहीं। #Murli #brahmakumari #Hindi #brahmakumaris #bkmurlitoday
- दिव्य बुद्धि (Hindi poem on Win over Maya)
Hindi poem on the Divine nature of Soul. How to defeat Maya of 5 vices? Purusharth to develop Divine nature from a devil-like nature. * आसुरी वृत्ति की हार * भीतर के मनोयुद्ध में ना मालूम कौन हारेगा कौन बचेगा जिंदा और कौन किसको मारेगा वर्षों से मनोयुद्ध सबके मन में चलता आया इसी युद्ध ने हमको देवता या असुर बनाया कहानी इस युद्ध की सदियों से आई चलती हर जन्म यह कहानी अपनी चाल बदलती कभी बनाती राजा हमें कभी ये रंक बनाती कभी चढ़ाती अर्श पे कभी फर्श पे गिराती बड़ा कमाल का है यह उठा पटक का खेल बनता और बिगड़ता है कर्मों का पोता मेल एक जन्म का पुण्य आगे हमको सुख देता अगर पाप किए तो दुःख भी हमें बहुत देता आने वाले हर दुख का हमने कारण जाना ईश्वर से मिले ज्ञान नेत्रों से इसको पहचाना हमने सब दुख बढ़ाये अपने ही विकर्मों से नाश करेंगे दुख का हम अपने ही सुकर्मों से युक्ति हमें मिल गई सम्पूर्ण सुखी बनने की कसम खाई आसुरी संस्कारों को बदलने की जीवन से विकारों को जड़ से हम मिटा देंगे आने वाले हर विघ्न को हम पथ से हटा देंगे अपना आत्म अभिमान पूरा हम जगा लेंगे देह त्याग से पहले खुद को पावन बना लेंगे आत्म भान को बनाएंगे जीवन का श्रृंगार हम जीतेंगे और होगी आसुरी वृत्ति की हार *ॐ शांति* ~~~ Useful links ~~~ Hindi Poems from Today's Murli Special Hindi poems (selected) NEWS - New uploads, and more Resources - Everything Audio Our mobile apps - Android . #brahmakumari #brahmakumaris #Hindi
- 25 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today Murli Poem)
Hindi Poem from today's murli. Aaj ki gyan murli se ek Kavita 25 Feb 2019. This poem is daily written on day's murli by Brahma Kumar (BK) Mukesh (from Rajasthan). To read more Hindi poems written, visit Murli Poems page. * मुरली कविता दिनांक 25.2.2019 * आत्म अभिमानी बनने से दैवी गुण आते जाएंगे अपार खुशी रहेगी क्रिमिनल ख्याल मिट जाएंगे स्मृति रखो हम दैवी स्वराज्य स्थापन करने वाले मृत्युलोक छोड़कर हम अमरलोक में जाने वाले ये स्मृति रखने से तुम्हारी चलन सुधरती जाएगी दैवी गुण जागृत होंगे और खुशी बढ़ती जाएगी हम बच्चे थे रामराज्य और सूर्यवंशी घराने वाले बहुत जल्द फिर से हम उसी राज्य में जाने वाले रावण ने ही छीना था सूर्यवंशी राम राज्य हमारा बाप ने आकर समझाया भूलो रावण राज्य सारा सदाकाल के सुख की दुनिया में हमको है जाना यही निश्चय जगाकर बच्चों सच्ची खुशी मनाना रावण ने यहां आकर हमारी चाल चलन बिगाड़ी सुख से भरी दुनिया हमारी उसने आकर उजाड़ी बेहद के बाप खुद ही आकर दैवीगुण सिखलाते इसी खुशी का बच्चों तुम पारा क्यों नहीं चढ़ाते सतयुग के दैवी गुण बच्चों फिर से धारण करना सर्वगुण सम्पन्न बनने की तुम पूरी मेहनत करना सुखदाता बाप के बच्चों तुम औरों को सुख देना अवगुणी आदतों के वश दुख ना किसी को देना बहुतों का कल्याण करना वाणी मीठी बनाकर जगतजीत देवता बनना विकारों पर जीत पाकर हम बच्चों की भाग्य रेखा स्वयं भगवान खींचते श्रेष्ठ भाग्य से अपने बच्चों की जन्मपत्री सींचते ब्राह्मणों के जीवन में सबकुछ अच्छा होने वाला स्वयं भाग्य विधाता हमें इसकी गारंटी देने वाला एक बाप से सर्व संबंधों का रस तुम लेते जाओ एकरस स्थिति का अनुभव हर पल करते जाओ *ॐ शांति* ---- Useful links ---- Online Services (all listed) Resources - Divine collection BK Google - A divine search engine for BKs Brahma Kumaris Website links Videos Gallery - YouTube playlist Follow our Main Blog . #Murli #Hindi #brahmakumaris
- 25 Feb 2019 आज की मुरली BK murli in Hindi
Brahma Kumaris murli today Hindi Aaj ki gyan murli Madhuban 25-02-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन "मीठे बच्चे - आत्म-अभिमानी बनने का अभ्यास करो तो दैवीगुण आते जायेंगे, क्रिमिनल ख्यालात समाप्त हो जायेंगे, अपार खुशी रहेगी'' प्रश्नः- अपनी चलन को सुधारने वा अपार खुशी में रहने के लिए कौन-सी बात सदा स्मृति में रखनी है? उत्तर:- सदा स्मृति रहे कि हम दैवी स्वराज्य स्थापन कर रहे हैं, हम मृत्युलोक को छोड़ अमरलोक में जा रहे हैं - इससे बहुत खुशी रहेगी, चलन भी सुधरती जायेगी क्योंकि अमरलोक नई दुनिया में जाने के लिए दैवीगुण जरूर चाहिए। स्वराज्य के लिए बहुतों का कल्याण भी करना पड़े, सबको रास्ता बताना पड़े। ओम् शान्ति। बच्चों को अपने को यहाँ का नहीं समझना चाहिए। तुमको मालूम हुआ है हमारा जो राज्य था जिसको रामराज्य वा सूर्यवंशी राज्य कहते हैं उसमें कितनी सुख-शान्ति थी। अब हम फिर से देवता बन रहे हैं। आगे भी बने थे। हम ही सर्वगुण सम्पन्न.... दैवीगुण वाले थे। हम अपने राज्य में थे। अभी रावण राज्य में हैं। हम अपने राज्य में बहुत सुखी थे। तो अन्दर में बहुत खुशी और निश्चय होना चाहिए क्योंकि तुम फिर से अपनी राजधानी में जा रहे हो। रावण ने तुम्हारा राज्य छीन लिया है। तुम जानते हो हमारा अपना सूर्यवंशी राज्य था। हम रामराज्य के थे, हम ही दैवीगुण वाले थे, हम ही बहुत सुखी थे फिर रावण ने हमारा राज्य-भाग्य छीन लिया। अब बाप आकर अपना और पराये का राज़ समझाते हैं। आधाकल्प हम रामराज्य में थे फिर आधाकल्प हम रावण राज्य में रहे। बच्चों को हर बात का निश्चय हो तो खुशी में रहें और चलन भी सुधरे। अब पराये राज्य में हम बहुत दु:खी हैं। हिन्दू भारतवासी समझते हैं हम पराये (फॉरेन) राज्य में दु:खी थे, अब सुखी हैं अपने राज्य में। परन्तु यह है अल्पकाल काग विष्टा समान सुख। तुम बच्चे अभी सदा काल के सुख की दुनिया में जा रहे हो। तो तुम बच्चों को अन्दर बहुत खुशी रहनी चाहिए। ज्ञान में नहीं हैं तो जैसे ठिक्कर पत्थरबुद्धि हैं। तुम बच्चे जानते हो हम अवश्य अपना राज्य लेंगे, इसमें तकलीफ की कोई बात नहीं। राज्य लिया था फिर आधा कल्प राज्य किया फिर रावण ने हमारी कला काया ही चट कर दी। कोई अच्छे बच्चे की जब चलन बिगड़ जाती है तो कहा जाता है तुम्हारी कला काया चट हो गई है क्या? यह हैं बेहद की बातें। समझना चाहिए माया ने हमारी कला काया चट कर दी। हम गिरते ही आये। अब बेहद का बाप दैवीगुण सिखलाते हैं। तो खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। टीचर नॉलेज देते हैं तो स्टूडेन्ट को खुशी होती है। यह है बेहद की नॉलेज। अपने को देखना है-मेरे में कोई आसुरी गुण तो नहीं हैं? सम्पूर्ण नहीं बनेंगे तो सजायें खानी पड़ेंगी। परन्तु हम सजायें खायें ही क्यों? इसलिए बाप, जिससे यह राज्य मिलता है उसको याद करना है। दैवीगुण जो हमारे में थे वह अब धारण करने हैं। वहाँ यथा राजा-रानी तथा प्रजा सबमें दैवीगुण थे। दैवीगुणों को तो समझते हो ना। अगर कोई समझते नहीं तो लायेंगे कैसे? गाते भी हैं सर्वगुण सम्पन्न.... तो पुरुषार्थ कर ऐसा बनना है। बनने में मेहनत लगती है। क्रिमिनल आई हो जाती है। बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझो तो क्रिमिनल ख्यालात उड़ जायेंगे। युक्तियां तो बाप बहुत समझाते हैं, जिसमें दैवीगुण हैं उनको देवता कहा जाता है, जिनमें नहीं हैं उनको मनुष्य कहा जाता है। हैं तो दोनों ही मनुष्य। परन्तु देवताओं को पूजते क्यों हैं? क्योंकि उनमें दैवीगुण हैं और उनके (मनुष्यों के) कर्तव्य बन्दर जैसे हैं। कितना आपस में लड़ाई-झगड़ा आदि करते हैं। सतयुग में ऐसी बातें होती नहीं। यहाँ तो होती है। जरूर अपनी भूल होती है तो सहन करना पड़ता है। आत्म-अभिमानी नहीं हैं तो सहन करना पड़ता है। तुम जितना आत्म-अभिमानी बनते जायेंगे उतने दैवीगुण भी धारण होंगे। अपनी जांच करनी है कि हमारे में दैवी गुण हैं? बाप सुखदाता है तो बच्चों का काम है सबको सुख देना। अपने दिल से पूछना है कि हम किसको दु:ख तो नहीं देते हैं? परन्तु कोई-कोई की आदत होती है जो दु:ख देने बिगर रह नहीं सकते। बिल्कुल सुधरते नहीं जैसे जेल बर्डस। वह जेल में ही अपने को सुखी समझते हैं। बाप कहते हैं वहाँ तो जेल आदि होता ही नहीं, पाप होता ही नहीं जो जेल में जाना पड़े। यहाँ जेल में सजायें भोगनी पड़ती हैं। अभी तुम समझते हो हम जब अपने राज्य में थे तो बहुत साहूकार थे, जो ब्राह्मण कुल वाले होंगे वह ऐसे ही समझेंगे कि हम अपना राज्य स्थापन कर रहे हैं। वह एक ही हमारा राज्य था, जिसको देवताओं का राज्य कहा जाता है। आत्मा को जब ज्ञान मिलता है तो खुशी होती है। जीव आत्मा जरूर कहना पड़े। हम जीव आत्मा जब देवी-देवता धर्म की थी तो सारे विश्व पर हमारा राज्य था। यह नॉलेज है तुम्हारे लिए। भारतवासी थोड़ेही समझते हैं कि हमारा राज्य था, हम भी सतोप्रधान थे। तुम ही यह सारी नॉलेज समझते हो। तो हम ही देवता थे और हमको ही अब बनना है। भल विघ्न भी पड़ते हैं परन्तु तुम्हारी दिन-प्रतिदिन उन्नति होती जायेगी। तुम्हारा नाम बाला होता जायेगा। सब समझेंगे यह अच्छी संस्था है, अच्छा काम कर रहे हैं। रास्ता भी बहुत सहज बताते हैं। कहते हैं तुम ही सतोप्रधान थे, देवता थे, अपनी राजधानी में थे। अब तमोप्रधान बने हो और तो कोई अपने को रावण राज्य में समझते नहीं हैं।तुम जानते हो हम कितने स्वच्छ थे, अब तुच्छ बने हैं। पुनर्जन्म लेते-लेते पारसबुद्धि से पत्थरबुद्धि बन पड़े हैं। अब हम अपना राज्य स्थापन कर रहे हैं तो तुमको उछलना चाहिए, पुरुषार्थ में लग जाना चाहिए। जो कल्प पहले लगे होंगे वे अब भी लगेंगे जरूर। नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार हम अपना दैवी राज्य स्थापन कर रहे हैं। यह भी तुम घड़ी-घड़ी भूल जाते हो। नहीं तो अन्दर बहुत खुशी रहनी चाहिए। एक-दो को यही याद दिलाओ कि मनमनाभव। बाप को याद करो जिससे ही अब राजाई लेते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। कल्प-कल्प हमको बाप श्रीमत देते हैं, जिससे हम दैवीगुण धारण करते हैं। नहीं तो सजायें खाकर फिर कम पद लेंगे। यह बड़ी भारी लॉटरी है। अब पुरुषार्थ कर ऊंच पद पाया तो कल्प-कल्पान्तर पाते ही रहेंगे। बाप कितना सहज समझाते हैं। प्रदर्शनी में भी यही समझाते रहो कि तुम भारतवासी ही देवताओं की राजधानी के थे फिर पुनर्जन्म लेते-लेते सीढ़ी नीचे उतरते-उतरते ऐसे बने हो। कितना सहज समझाते हैं। सुप्रीम बाप, सुप्रीम टीचर, सुप्रीम गुरू है ना। तुम कितने ढेर स्टूडेन्ट हो, दौड़ी लगाते रहते हो। बाबा भी लिस्ट मंगाते रहते हैं कितने निर्विकारी पवित्र बने हैं?बच्चों को समझाया गया है कि भृकुटी के बीच में आत्मा चमकती है। बाप कहते हैं मैं भी यहाँ आकर बैठता हूँ। अपना पार्ट बजाता हूँ। मेरा पार्ट ही है पतितों को पावन बनाना। ज्ञान सागर हूँ। बच्चे पैदा होते हैं, कोई तो बहुत अच्छे होते हैं, कोई खराब भी निकल पड़ते हैं। फिर आश्चर्यवत् सुनन्ती, कथन्ती, भागन्ती हो जाते हैं। अरे माया, तुम कितनी प्रबल हो। फिर भी बाप कहते हैं भागन्ती होकर भी कहाँ जायेंगे? यही एक बाप तारने वाला है। एक बाप है सद्गति दाता, बाकी इस ज्ञान को कोई तो बिल्कुल जानते ही नहीं। जिसने कल्प पहले माना है, वही मानेंगे। इसमें अपनी चलन को बहुत सुधारना पड़ता है, सर्विस करनी पड़ती है। बहुतों का कल्याण करना है। बहुतों को जाकर रास्ता बताना है। बहुत-बहुत मीठी जबान से समझाना है कि तुम भारतवासी ही विश्व के मालिक थे। अब फिर तुम इस प्रकार से अपना राज्य ले सकते हो। यह तो तुम समझते हो बाप जो समझाते हैं, ऐसा कोई समझा न सके फिर भी चलते-चलते माया से हार खा लेते हैं। बाप खुद कहते हैं विकारों पर जीत पाने से ही तुम जगतजीत बनेंगे। यह देवतायें जगतजीत बने हैं। जरूर उन्हों ने ऐसा कर्म किया है। बाप ने कर्मों की गति भी बताई है। रावण राज्य में कर्म विकर्म ही होते हैं, राम राज्य में कर्म अकर्म होते हैं। मूल बात है काम पर जीत पाकर जगतजीत बनने की। बाप को याद करो, अब वापिस घर जाना है। हमको 100 परसेन्ट सरटेन है कि हम अपना राज्य लेकर ही छोड़ेंगे। परन्तु राज्य यहाँ नहीं करेंगे। यहाँ राज्य लेते हैं। राज्य करेंगे अमरलोक में। अब मृत्युलोक और अमरलोक के बीच में हैं, यह भी भूल जाते हैं इसलिए बाप घड़ी-घड़ी याद दिलाते हैं। अब यह पक्का निश्चय है कि हम अपनी राजधानी में जायेंगे। यह पुरानी राजधानी खत्म जरूर होनी है। अब नई दुनिया में जाने के लिए दैवीगुण जरूर धारण करने हैं। अपने से बातें करनी है। अपने को आत्मा समझना है क्योंकि अभी ही हमको वापस जाना है। तो अपने को आत्मा भी अभी ही समझना है फिर कभी वापिस थोड़ेही जाना है जो यह ज्ञान मिलेगा। वहाँ 5 विकार ही नहीं होंगे जो हम योग लगायें। योग तो इस समय लगाना होता है पावन बनने के लिए। वहाँ तो सब सुधरे हुए हैं। फिर धीरे-धीरे कला कम होती जाती है। यह तो बहुत सहज है, क्रोध भी किसको दु:ख देता है ना। मुख्य है देह-अभिमान। वहाँ तो देह-अभिमान होता ही नहीं। आत्म-अभिमानी होने से क्रिमिनल आई नहीं रहती। सिविल आई बन जाती है। रावण राज्य में क्रिमिनल आई बन जाती है। तुम जानते हो हम अपने राज्य में बहुत सुखी रहते हैं। कोई काम नहीं, कोई क्रोध नहीं, इस पर शुरू का गीत भी बना हुआ है। वहाँ यह विकार होते नहीं। हमारी अनेक बार यह हार और जीत हुई है। सतयुग से कलियुग तक जो कुछ हुआ वह फिर रिपीट होना है। बाप अथवा टीचर के पास जो नॉलेज है वह तुमको सुनाते रहते हैं। यह रूहानी टीचर भी वन्डरफुल है। ऊंचे से ऊंचा भगवान्, ऊंचे से ऊंचा टीचर भी है और हमको भी ऊंचे से ऊंचा देवता बनाते हैं। तुम खुद देख रहे हो - बाप कैसे डिटीज्म स्थापन कर रहे हैं। तुम खुद ही देवता बन रहे हो। अभी तो सभी अपने को हिन्दू कहते रहते हैं। उन्हों को भी समझाया जाता है कि वास्तव में आदि सनातन देवी-देवता धर्म है और सबका धर्म चलता रहता है। यह एक ही देवी-देवता धर्म है, जो प्राय:लोप हो गया है। यह तो बहुत पवित्र धर्म है। इन जैसा पवित्र धर्म कोई होता नहीं। अब पवित्र न होने कारण कोई भी अपने को देवता नहीं कहला सकते हैं। तुम समझा सकते हो कि हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के थे तब तो देवताओं को पूजते हैं। क्राइस्ट को पूजने वाले क्रिश्चियन ठहरे, बुद्ध को पूजने वाले बौद्धी ठहरे, देवताओं को पूजने वाले देवता ठहरे। फिर अपने को हिन्दू क्यों कहलाते हो? युक्ति से समझाना है। सिर्फ कहेंगे हिन्दू धर्म, धर्म नहीं है, तो बिगड़ेंगे। बोलो, हिन्दू आदि सनातन धर्म के थे तो कुछ समझें कि आदि सनातन धर्म तो कोई हिन्दू नहीं है। आदि सनातन अक्षर ठीक है। देवता पवित्र थे, यह अपवित्र हैं इसलिए अपने को देवता नहीं कहला सकते हैं। कल्प-कल्प ऐसे होता है, इनके राज्य में कितने साहूकार थे। अब तो कंगाल बन पड़े हैं। वह पद्मापद्मपति थे। बाप युक्तियां बहुत अच्छी देते हैं। पूछा जाता है तुम सतयुग में रहने वाले हो या कलियुग में? कलियुग के हो तो जरूर नर्कवासी हो। सतयुग में रहने वाले तो स्वर्गवासी देवता होंगे। ऐसा प्रश्न पूछेंगे तो समझेंगे कि प्रश्न पूछने वाला जरूर खुद ट्रान्सफर कर देवता बना सकते होंगे। और तो कोई पूछ नहीं सकते। वह भक्ति मार्ग ही अलग है। भक्ति का फल क्या है? वह है ज्ञान। सतयुग-त्रेता में भक्ति होती नहीं। ज्ञान से आधा कल्प दिन, भक्ति से आधा कल्प रात। मानने वाले होंगे तो मानेंगे। न मानने वाले तो ज्ञान को भी नहीं मानेंगे तो भक्ति को भी नहीं मानेंगे। सिर्फ पैसा कमाना ही जानते हैं।तुम बच्चे तो योगबल से अब राजाई स्थापन कर रहे हो श्रीमत पर। फिर आधा कल्प के बाद राज्य गँवाते भी हो। यह चक्र चलता ही रहता है। अच्छा! मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार:- 1. बहुतों का कल्याण करने के लिए अपनी जबान बहुत मीठी बनानी है। मीठी जबान से सर्विस करनी है। सहनशील बनना है। 2. कर्मो की गहन गति को समझ विकारों पर जीत पानी है। जगतजीत देवता बनना है। आत्म-अभिमानी बन क्रिमिनल दृष्टि को सिविल बनाना है। वरदान:- ब्राह्मण जन्म की जन्मपत्री को जान सदा खुशी में रहने वाले श्रेष्ठ भाग्यवान भव ब्राह्मण जीवन नया जीवन है, ब्राह्मण आदि में देवी-देवता हैं और अभी बी.के. हैं। ब्राह्मणों की जन्म पत्री में तीनों ही काल अच्छे से अच्छा है। जो हुआ वह भी अच्छा और जो हो रहा है वो और अच्छा और जो होने वाला है वह बहुत-बहुत अच्छा। ब्राह्मण जीवन की जन्मपत्री सदा ही अच्छी है, गैरन्टी है। तो सदा इसी खुशी में रहो कि स्वयं भाग्य विधाता बाप ने भाग्य की श्रेष्ठ रेखा खींच दी, अपना बना लिया। स्लोगन:- एकरस स्थिति का अनुभव करना है तो एक बाप से सर्व सम्बन्धों का रस लो। #Murli #brahmakumari #Hindi #brahmakumaris #bkmurlitoday
- शिवरात्रि (Shivratri Slogans in Hindi)
Below are slogans for Shivatri (decent of the incorporeal God Shiv, the Supreme father of all Souls). Maha Shivratri is clebrated in India since ancient time as a remembrance of God's coming. Here are slogans to imbibe in your own life and to inspire others. To download/print, here is the PDF version. Do SHARE this blog post to many in your connections. शिवजयंती (शिवरात्रि) स्लोगन सर्व पर्वो में पर्व महान शिवजयंती है सर्व महान। सव सत्यों में सत्य महान शिव हैं गीता के भगवान। शिवजयंती फिर से है आई लाखों लाख मुबारके बधाई। स्वयं शिव परमात्मा इस धरा पर आते हैं। ब्रह्मा तन साकार ले सत्य ज्ञान सुनाते हैं। शिव निराकार ज्योतिविन्द हैं। सर्वगुणों में वे तो सिन्धु हैं। शिव ज्ञान की गंगा बहाते शिव धरा को स्वर्ग बनाते। शिव में समाया संसार है, शिव महिमा अपरंपार है। शिव दुखहर्ता सुख कर्ता हैं, शिव सर्व के मात-पिता भर्ता हैं। शिव गति-सद्गति दाता हैं, शिव भाग्यविधाता वरदाता हैं। शिव मानव को देव बनाते, शिव धरा को स्वर्ग बनाते। शिव काल के पंजे से छुड़ाने वाले हैं। शिव जीवन नैया पार लगाने वाले हैं। शिव का हुआ है धरा पर आगमन करो अब अज्ञान निद्रा से जागरण। भारत भू पर शिव पधारे भर लो भाग्य के भण्डारे। शिव को जानो, पहचानो, उनसे योग लगा लो शिव बहा रहे ज्ञान-गंगा, खुद को पावन वना लो । जीवन नैया कर दे शिव के हवाले जैसे वो चाहे वैसे इसको संभाले । शिव सबके भाग्य जगाते शिव से जोड़ लो दिल के नाते । इस शिवरात्रि पर रहो नशे से दूर शिव कर देंगे सुख-शान्ति से भरपूर । आज शिवमय है धरा और शिवमय है गगन शिवमय हुई दिशायें, शिवमय हर इक मन । नशे की आदत है गर कोई बीड़ी, शराब, गुटखा, पान यही तो अक धतूरे हैं। कर दें इन्हें शिव को दान तभी इस शिवरात्रि पर पायेंगे भोलेनाथ से वरदान। अज्ञान अंधेरा मन का हटाकर ज्ञान का दीपक जलायें खुद को जानें शिव को पहचानें तब सच्ची शिवरात्रि मनायें शिव तो निराकार ज्योतिबिन्दुस्वरूप नहीं उनका देह का रूप फिर क्यों ये इल्जाम लगाया है। शिव ने भांग धतूरा खाया है। ~~~ Useful links ~~~ PDF version of this Slogans Maha Shivratri - Everything about Article - Why is Shiva's birth shown in Ratri? PDF - Spiritual Significance of Shivratri Revelations from Gyan Murli More Articles - Hindi & English BK Google - Our Search Engine . #Hindi #brahmakumaris #brahmakumari
- 23 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today Murli Poem)
Hindi Poem from today's murli. Aaj ki gyan murli se ek Kavita 22 Feb 2019. This poem is daily written on day's murli by Brahma Kumar (BK) Mukesh (from Rajasthan). To read more Hindi poems written, visit Murli Poems page. * मुरली कविता दिनांक 23.2.2019 * निराकार शिव की बायोग्राफी औरों को सुनाओ हीरे तुल्य शिव जयन्ती का अर्थ सबको बताओ शिवबाबा ही आकर आत्मा रूपी दीपक जगाते इसी कारण हम शिव जयन्ती धूमधाम से मनाते पूछो दुनिया वालों को शिव कब धरा पर आया आकर उसने धरती पर कौनसा कर्तव्य निभाया धूमधाम और उमंग से तुम शिवजयन्ती मनाओ देवताओं की बायोग्राफी मन्दिर जाकर सुनाओ ज्ञान घृत से आत्मा रूपी दीपक रखो जलाकर सबको प्रकाश में लाओ अज्ञान अंधेरा मिटाकर श्रेष्ठ स्मृति के द्वारा ही वायुमण्डल श्रेष्ठ बनाओ सबका सहयोग करके तुम विश्व प्रिय बन जाओ धारण कर लो अपनी अचल स्थिति का आसन तभी मिलेगा तुम्हें सारे विश्व का राज्य सिंहासन *ॐ शांति* ---- Useful links ---- Online Services (all listed) Resources - Divine collection BK Google - A divine search engine for BKs Brahma Kumaris Website links Videos Gallery - YouTube playlist Follow our Main Blog . #Murli #Hindi #brahmakumaris
- 22 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today Murli Poem)
Hindi Poem from today's murli. Aaj ki gyan murli se ek Kavita 22 Feb 2019. This poem is daily written on day's murli by Brahma Kumar (BK) Mukesh (from Rajasthan). To read more Hindi poems written, visit Murli Poems page. * मुरली कविता दिनांक 22.2.2019 * ब्राह्मण छोटी की स्मृति हर्षित रहने का आधार खुद से बात करके तुम पाओगे खुशियां अपार पानी है बाप की शरण तो नष्टोमोहा बन जाओ मित्र सम्बन्धियों में कभी बुद्धि नहीं भटकाओ सबसे बुद्धियोग तोड़कर बाप में बुद्धि लगाओ सेवा लायक बनकर तुम शरण बाप की पाओ दुख जीवन में तब आता पतित जब बन जाते जीवन में सुख आता जब पावन हम बन जाते हमें सतोप्रधान बनाने वाला राजयोग है महान राजयोग सिखलाता हमको गीता का भगवान भगवान हमको पढ़ाते ये निश्चय जिसे हो जाता नष्टोमोहा बनकर वो अमृत पिता और पिलाता सर्विसेबल बच्चे ही बाप की दिल पर चढ़ पाते बाप शरण में लेकर उनको विष पीने से बचाते औरों को ज्ञान समझाकर मन में खुश ना होना बाप को याद करके ही तुम रोज रात को सोना माया शत्रु का विघ्न हर बच्चे के सम्मुख आता जो माया को जीते वो कर्मातीत अवस्था पाता सदा हर्षित रहने के लिए रूहानी सर्विस करना श्रीमत पर अपना और सबका कल्याण करना पुराने जग से दिल हटाकर नष्टोमोहा बन जाना सच्चे दिल से सच्ची प्रीत एक बाप से निभाना अपने कर्म और योग में सन्तुलन रखते जाओ बाप की ब्लेसिंग अपने हर कर्म में पाते जाओ कर्म अगर अच्छा है तो सबके मन को भाएगा अच्छा कर्म करने वाला सबकी दुआएँ पाएगा संकल्पों को स्टॉप करने का अभ्यास बढ़ाओ अपनी कर्मातीत अवस्था सहज समीप लाओ *ॐ शांति* ---- Useful links ---- Online Services (all listed) Resources - Divine collection BK Google - A divine search engine for BKs Brahma Kumaris Website links Videos Gallery - YouTube playlist Follow our Main Blog . #Murli #Hindi #brahmakumaris
- आज की मुरली 22 Feb 2019 BK murli in Hindi
BrahmaKumaris murli today Hindi Aaj ki murli Madhuban 22-02-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन "मीठे बच्चे - सदा याद रखो कि हम ब्राह्मण चोटी हैं, पुरूषोत्तम बन रहे हैं तो हर्षित रहेंगे, अपने आप से बातें करना सीखो तो अपार खुशी रहेगी।'' प्रश्नः- बाप की शरण में कौन आ सकते हैं? बाप शरण किसको देते हैं? उत्तर:- बाप की शरण में वही आ सकते हैं जो पूरा-पूरा नष्टोमोहा हो। जिनका बुद्धियोग सब तऱफ से टूटा हुआ हो। मित्र सम्बन्धियों आदि में बुद्धि की लागत न हो। बुद्धि में रहे मेरा तो एक बाबा दूसरा न कोई। ऐसे बच्चे ही सर्विस कर सकते हैं। बाप भी ऐसे बच्चों को ही शरण देते हैं। ओम् शान्ति। यह है रूहानी बाप, टीचर, गुरू। यह तो बच्चे अच्छी रीति समझ गये हैं दुनिया इन बातों को नहीं जानती। भल सन्यासी कहते हैं शिवोहम्। तो भी ऐसे नहीं कहेंगे कि हम बाप टीचर गुरू हैं। वह सिर्फ कहते हैं शिवोहम् तत् त्वम्। परमात्मा सर्वव्यापी है तो हरेक बाप टीचर गुरू हो जाये। ऐसे तो कोई समझते भी नहीं। मनुष्य अपने को भगवान, परमात्मा कहलायें यह तो बिल्कुल ही रांग है। बच्चों को जो बाप समझाते हैं वह तो बुद्धि में धारण होता है ना। उस पढ़ाई में कितनी सब्जेक्ट होती हैं, ऐसे नहीं सब सब्जेक्ट स्टूडेन्ट की बुद्धि में रहती हैं। यहाँ जो बाप पढ़ाते हैं वह एक सेकेण्ड में बच्चों की बुद्धि में आ जाता है। तुम रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त का ज्ञान सुनाते हो। तुम ही त्रिकालदर्शी वा स्वदर्शन चक्रधारी बनते हो। उस जिस्मानी पढ़ाई में सब्जेक्ट बिल्कुल अलग हैं। तुम सिद्ध कर समझाते हो, सर्व का सद्गति दाता वह एक ही बाप है। सभी आत्मायें परमात्मा को याद करती हैं। कहती हैं ओ गॉड फादर। तो ज़रूर बाप से वर्सा मिलता होगा। वह वर्सा खोने से दु:ख में आ जाते हैं। यह सुख दु:ख का खेल है। इस समय सभी पतित दु:खी हैं। पवित्र बनने से सुख ज़रूर मिलता है। सुख की दुनिया बाप स्थापन करते हैं। बच्चों को बुद्धि में यह रखना है कि हमको बाप समझाते हैं, नॉलेजफुल एक बाप ही है। सृष्टि के आदि मध्य अन्त का ज्ञान बाप ही देते हैं। और सभी धर्म जो स्थापन हुए हैं वह अपने समय पर आयेंगे। यह बातें और कोई की बुद्धि में नहीं हैं। तुम बच्चों के लिए बाप ने यह पढ़ाई बिल्कुल सहज रखी है। सिर्फ थोड़ा विस्तार से समझाते हैं। मुझ बाप को याद करो तो तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। योग की महिमा बहुत है। प्राचीन योग भारत का गाया हुआ है। परन्तु योग से फायदा क्या हुआ था, यह किसको पता नहीं है। यह है गीता का वही योग जो निराकार भगवान सिखलाते हैं। बाकी जो भी सिखलाते हैं वह मनुष्य हैं, देवताओं के पास तो योग की बात ही नहीं। यह हठयोग आदि सब मनुष्य सिखलाते हैं। देवतायें न सीखते हैं, न सिखलाते हैं। दैवी दुनिया में योग की बात नहीं। योग से सब पावन बन जाते हैं। वह ज़रूर यहाँ बनेंगे। बाप आते ही हैं संगम पर नई दुनिया बनाने। अभी तुम पुरानी दुनिया से नई दुनिया में बदली हो रहे हो। यह किसको समझाना भी वन्डर है। हम ब्राह्मण चोटी हैं, सतयुग और कलियुग के बीच में हैं ब्राह्मण चोटी। इसको ही संगमयुग कहा जाता है, जिसमें तुम पुरूषोत्तम बन रहे हो। यह बच्चों की बुद्धि में रहे कि हम पुरूषोत्तम बनते हैं तो सदैव हर्षित रहेंगे। जितना सर्विस करेंगे उतना हर्षित रहेंगे। कमाई करनी और करानी है। जितना प्रदर्शनी में सर्विस करेंगे तो सुनने वालों को भी सुख मिलेगा। अपना और दूसरों का कल्याण होगा। छोटे सेन्टर पर भी मुख्य 5-6 चित्र ज़रूर चाहिए। उन पर समझाना सहज है। सारा दिन सर्विस ही सर्विस। मित्र सम्बन्धियों तऱफ कोई भी लागत नहीं होनी चाहिए। जो इन ऑखों से देख रहे हो उन सबका विनाश होना है। बाकी जो दिव्य दृष्टि से देखते हो उनकी स्थापना हो रही है। ऐसे अपने से बातें करो तो तुम पक्के हो जायेंगे। बेहद के बाप से मिलने की खुशी होनी चाहिए। कोई राजा के पास जन्म लेता है तो कितना फखुर में रहता है। तुम बच्चे स्वर्ग के मालिक बन रहे हो। हर एक अपने लिए मेहनत कर रहे हैं। बाप सिर्फ कहते हैं काम चिता पर बैठ तुम काले हो गये हो। अब ज्ञान चिता पर बैठो तो गोरे बन जायेंगे। बुद्धि में यही चिन्तन चलता रहे, भल ऑफिस में काम करते रहो, याद करते रहो। ऐसे नहीं फुर्सत नहीं है। जितनी फुर्सत मिले रूहानी कमाई करो। कितनी बड़ी कमाई है। हेल्थ वेल्थ दोनों एक साथ मिलती हैं। एक कहानी है अर्जुन और भील की। ऐसे गृहस्थ व्यवहार में रहकर ज्ञान-योग में अन्दर वालों से भी तीखे जा सकते हैं। सारा मदार याद पर है। यहाँ सब बैठ जायेंगे तो सर्विस कैसे करेंगे। रिफ्रेश होकर सर्विस में लग जाना है। सर्विस का ख्याल रखना चाहिए। बाबा तो प्रदर्शनी में जा न सके क्योंकि बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। बाबा की आत्मा और इनकी आत्मा इकट्ठी है। यह वन्डरफुल युगल है। इस युगल को तुम बच्चों के सिवाए कोई जान न सके। अपने को युगल भी समझते हैं फिर भी कहते हैं मैं एक ही बाबा का सिकीलधा बच्चा हूँ। इस लक्ष्मी-नारायण के चित्र को देखकर बहुत खुशी होती है। हमारा दूसरा जन्म यह है, हम गद्दी पर जरूर बैठेंगे। तुम भी राजयोग सीख रहे हो, एम आब्जेक्ट सामने खड़ी है। इन्हें तो खुशी है कि मैं बाबा का सिकीलधा बच्चा हूँ। फिर भी सदैव याद ठहरती नहीं। और-और तऱफ ख्यालात चले जाते हैं। ड्रामा का लॉ नहीं जो एकदम याद ठहर जाए और कोई ख्याल न आये। माया के तूफान याद नहीं करने देते। जानता हूँ हमारे लिए बहुत सहज है, क्योंकि बाबा की प्रवेशता है। बाबा का नम्बरवन सिकीलधा बच्चा हूँ। पहले नम्बर में राजकुमार बनूँगा फिर भी याद भूल जाती है। अनेक प्रकार के ख्यालात आ जाते हैं। यह है माया। जब इस बाबा को अनुभव हो तब तो तुम बच्चों को समझा सके। यह ख्यालात बन्द तब होंगे जब कर्मातीत अवस्था होगी। आत्मा सम्पूर्ण बन जाए फिर तो यह शरीर रह न सके। शिवबाबा तो सदैव प्योर ही प्योर है। पतित दुनिया और पतित शरीर में आकर पावन बनाने का पार्ट भी इनका ही है। ड्रामा में बंधायमान हैं। तुम पावन बन गये तो फिर नया शरीर चाहिए। शिवबाबा को अपना शरीर तो है नहीं। इस तन में इस आत्मा का महत्व है। उनका रखा क्या है! वह तो मुरली चलाकर चले जाते हैं। वह फ्री हैं। कभी कहाँ, कभी कहाँ चले जायेंगे। बच्चों को भी फील होता है कि यह शिवबाबा मुरली चला रहे हैं। तुम बच्चे समझते हो हम बाप को मदद करने के लिए इस गॉडली सर्विस पर खड़े हैं। बाप कहते हैं हम भी अपना स्वीट होम छोड़कर आये हैं। परमधाम अर्थात् परे ते परे धाम है मूलवतन। बाकी खेल सारा सृष्टि पर चलता है। तुम जानते हो यह वन्डरफुल खेल है। बाकी दुनिया एक है।वो लोग चांद पर जाने की कोशिश करते हैं, यह तो साइन्स का बल है। साइलेन्स के बल से हम जब साइन्स पर जीत पाते हैं तब साइन्स भी सुखदाई बन जाती है। यहाँ साइन्स सुख भी देती है तो दु:ख भी देती है। वहाँ तो सुख ही सुख है। दु:ख का नाम नहीं। ऐसी बातें सारा दिन बुद्धि में रहनी चाहिए। बाबा को कितने ख्यालात रहते हैं। बाँधेलियाँ विष पर कितनी मारें खाती हैं। कोई तो मोह वश फिर फँस पड़ते हैं। निश्चयबुद्धि वाले झट कहेंगे हमको अमृत पीना है, इसमें नष्टोमोहा चाहिए। पुरानी दुनिया से दिल उठ जानी चाहिए। ऐसे ही सर्विसएबुल दिल पर चढ़ सकते हैं। उनको शरणागति दे सकते हैं। कन्या पति की शरण में जाती है, विष बिगर नहीं रखते। फिर बाप को शरण लेना पड़ता है। परन्तु एकदम नष्टोमोहा चाहिए। पतियों का पति मिला अब उनसे हम बुद्धियोग की सगाई करते हैं। बस मेरा तो एक दूसरा न कोई। जैसे कन्या की पति से प्रीत जुट जाती है, यह है आत्मा की प्रीत परमात्मा से। उनसे दु:ख मिलता है, इनसे सुख मिलता है। यह है संगम, इसको कोई जानता नहीं। तुमको कितनी खुशी होनी चाहिए। हमको खिवैया अथवा बागवान मिला है, जो हमको फूलों के बगीचे में ले जाते हैं। इस समय सभी मनुष्य काँटे मिसल बन पड़े हैं। सबसे बड़ा काँटा है काम का। पहले तुम निर्विकारी फूल थे, धीरे-धीरे कला कम हो गई अब तो बड़े काँटे हो गये हो। बाबा को बबुलनाथ भी कहते हैं। तुम जानते हो असली नाम शिव है। बबुलनाथ नाम रखते हैं क्योंकि काँटों को फूल बनाते हैं। भक्ति मार्ग में बहुत नाम रखते हैं। वास्तव में नाम एक ही शिव है। रूद्र ज्ञान यज्ञ वा शिव ज्ञान यज्ञ बात एक ही है। रूद्र यज्ञ से विनाश ज्वाला निकली और श्रीकृष्णपुरी अथवा आदि सनातन देवी देवता धर्म की स्थापना हुई। तुम इस यज्ञ द्वारा मनुष्य से देवता बनते हो। चित्र भी वन्डरफुल बनाते हैं। विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला। यह सब बातें तुम जानते हो कि ब्रह्मा सरस्वती ही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। यह निश्चय है। लक्ष्मी-नारायण ही 84 जन्मों के बाद ब्रह्मा सरस्वती बनते हैं। मनुष्य तो ऐसी बातें सुनकर चक्रित होते होंगे। खुशी में भी आते होंगे। परन्तु माया कम नहीं है। काम महाशत्रु है। माया नाम रूप में फँसाए गिरा देती है। बाप को याद करने नहीं देती। फिर वह खुशी कम हो जाती है। इसमें खुश नहीं होना चाहिए कि हम बहुतों को समझाते हैं, पहले देखना है बाबा को कितना याद करता हूँ। रात को बाबा को याद करके सोता हूँ या भूल जाता हूँ। कोई बच्चे तो पक्के नेमी भी हैं।तुम बच्चे बहुत लक्की हो। बाप के ऊपर तो बहुत बोझ हैं। परन्तु फिर भी रथ को रियायत मिल जाती है। ज्ञान और योग भी है, इसके बिगर लक्ष्मी-नारायण पद कैसे पायेंगे। खुशी तो रहती है, हम अकेला बाप का बच्चा हूँ और फिर मेरे ढेर बच्चे हैं, यह नशा भी रहता है तो माया विघ्न भी डालती है। बच्चों को भी माया के विघ्न आते होंगे। कर्मातीत अवस्था आगे चलकर आनी है। यह बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। कहते हैं मीठे-मीठे बच्चे.. बाप तो प्यार का सागर है। इनकी आत्मा इकट्ठी है। यह भी प्यार करते हैं। समझते हैं जैसा कर्म मैं करुँगा, मुझे देख और भी करेंगे। बहुत मीठा रहना है। बच्चे बड़े सयाने चाहिए। इन लक्ष्मी-नारायण में देखो कितनी सयानप है। सयानप से विश्व का राज्य लिया है। प्रदर्शनी द्वारा प्रजा तो बहुत बनती है। भारत बहुत बड़ा है, इतनी सर्विस करनी है। दूसरा याद में रहकर विकर्म भी विनाश करने हैं। यह है कड़ा फुरना (फिकर)। हम तमोप्रधान से सतोप्रधान कैसे बनें? इसमें मेहनत है। सर्विस के चांस बहुत हैं। ट्रेन में बैज पर सर्विस कर सकते हो। यह बाबा यह वर्सा। बरोबर 5 हज़ार वर्ष पहले भारत स्वर्ग था। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। फिर ज़रूर इनका राज्य आना चाहिए। हम बाबा की याद से पावन दुनिया का मालिक बन रहे हैं। ट्रेन में बहुत सर्विस हो सकती है। एक डिब्बे में सर्विस कर फिर दूसरे में जाना चाहिए। ऐसी सर्विस करने वाला ही दिल पर चढ़ेगा। बोलो, हम आपको खुशखबरी सुनाते हैं। तुम पूज्य देवता थे फिर 84 जन्म ले पुजारी बने। अब फिर पूज्य बनो। सीढ़ी अच्छी है, इनसे ही सतो रजो तमो स्टेज सिद्ध करनी है। स्कूल में पिछाड़ी में गैलप करने का शौक होता है। अब यहाँ भी समझाया जाता है जिन्हों ने टाइम वेस्ट किया है, उन्हों को गैलप कर सर्विस में लग जाना चाहिए। सर्विस की मार्जिन बहुत है। सर्विसएबुल बच्चियाँ बहुत निकलनी चाहिए, जिनको बाबा कहाँ भी भेज दे। मन्दिरों में सर्विस अच्छी होगी। देवता धर्म वाले झट समझेंगे। गंगा स्नान पर भी तुम समझा सकते हो, तो दिल पर लगेगा ज़रूर। अच्छा। मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार:- 1) सदा हर्षित रहने के लिए रूहानी सर्विस करनी है, सच्ची कमाई करनी और करानी है। अपना और दूसरों का कल्याण करना है। ट्रेन में भी बैज पर सर्विस करनी है। 2) पुरानी दुनिया से दिल हटा लेनी है। नष्टोमोहा बनना है, एक बाप से सच्ची प्रीत रखनी है। वरदान:- कर्म और योग के बैलेन्स द्वारा ब्लैसिंग का अनुभव करने वाले कर्मयोगी भव कर्मयोगी अर्थात् हर कर्म योगयुक्त हो। कर्मयोगी आत्मा सदा ही कर्म और योग का साथ अर्थात् बैलेन्स रखने वाली होगी। कर्म और योग का बैलेन्स होने से हर कर्म में बाप द्वारा तो ब्लैसिंग मिलती ही है लेकिन जिसके भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हैं उनसे भी दुआयें मिलती हैं। कोई अच्छा काम करता है तो दिल से उसके लिए दुआयें निकलती हैं कि बहुत अच्छा है। बहुत अच्छा मानना ही दुआयें हैं। स्लोगन:- सेकेण्ड में संकल्पों को स्टॉप करने का अभ्यास ही कर्मातीत अवस्था के समीप लायेगा। #Murli #brahmakumari #Hindi #brahmakumaris #bkmurlitoday
- 21 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today Murli Poem)
Hindi Poem from today's murli. Aaj ki gyan murli se ek Kavita 21 Feb 2019. This poem is daily written on day's murli by Brahma Kumar (BK) Mukesh (from Rajasthan). To read more Hindi poems written, visit Murli Poems page. * मुरली कविता दिनांक 21.2.2019 * आत्म अभिमान तुम्हें विश्व का मालिक बनाता देह अभिमान तुम्हें कंगाली की तरफ ले जाता खुद को एक्टर समझकर अपना पार्ट बजाओ अशरीरीपन का तुम बार बार अभ्यास बढ़ाओ भाई भाई की दृष्टि रखकर पावन बनते जाओगे क्रिमिनल ख्यालातों से सहज ही मुक्ति पाओगे अपने ही बेसमझ बच्चों को बाप यही समझाते पुनर्जन्म में आकर तुम बच्चे कलाहीन हो जाते बाप अपने बच्चों की इसी बात का वण्डर खाते अच्छे अच्छे बच्चे भी तकदीर को लकीर लगाते दैवी गुणों के बारे में भले ही सबको ज्ञान सुनाते ज्ञान को ना समझकर अवगुण खुद ही अपनाते अशरीरीपन का अभ्यास कर दृष्टि शुद्ध बनाओ आत्मा बनकर तुम आत्मा से बात करते जाओ अपने अन्दर ज्ञान योग की ताक़त को बढ़ाओ दैवीगुणों की सम्पन्नता से चरित्र सुधारते जाओ विश्व कल्याण की जिम्मेवारी उमंग से निभाओ आलस्य और अलबेलेपन से मुक्ति पाते जाओ उमंग और उत्साह तुम्हें सेवा में अथक बनाएगा चेहरे और चलन से औरों का उत्साह बढ़ाएगा समय प्रमाण शक्तियों का उपयोग करते जाओ ज्ञानी योगी तू आत्मा का टाइटल बाप से पाओ *ॐ शांति* ---- Useful links ---- Online Services (all listed) Resources - Divine collection BK Google - A divine search engine for BKs Brahma Kumaris Website links Videos Gallery - YouTube playlist Follow our Main Blog . #Murli #Hindi #brahmakumaris
- 21 Feb 2019 BK murli today in English
Brahma Kumaris murli today in English 21/02/19 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban Sweet children, soul consciousness makes you into the masters of the world whereas body consciousness makes you poverty-stricken. Therefore, may you be soul conscious. Question: Which practice helps you a lot to become bodiless? Answer: Always consider yourself to be an actor. Just as an actor takes off his costume as soon as his part is over, in the same way, you children also have to practise this. As soon as you finish performing your actions, take off your costumes (bodies) and become bodiless. Continue to practise being brother souls. This is the easy way to become pure. By looking at the body, there are criminal thoughts. Therefore, may you be bodiless. Om Shanti . The Father sits here and explains to you children because you have become very senseless. This was also explained to you 5000 years ago and you were also taught how to perform divine actions. You went into the deity religion and then, according to the drama plan, you continued to take rebirth. Your degrees decreased and you have now reached the stage where there are practically nil degrees remaining because this is the tamopradhan kingdom of Ravan. Before this kingdom of Ravan everything was at first satopradhan. Then it went through the stages of sato, rajo and tamo. It has now become completely tamopradhan. It is now the end of it. The kingdom of Ravan is called the devilish kingdom. In Bharat there is the fashion of burning Ravan. Only the people of Bharat speak of the kingdom of Rama and the kingdom of Ravan. The kingdom of Rama exists in the golden age and the kingdom of Ravan exists in the iron age. These matters have to be understood. Baba is amazed that very good children cross out the line of their fortune because they don’t fully understand. The defects of Ravan cling to them. They themselves speak of divine virtues. The Father has explained to you that you were those same deities. You have experienced 84 births. The difference and how you have become tamopradhan has been explained to you. This is the kingdom of Ravan. Ravan is the greatest enemy and has made Bharat poverty-stricken and tamopradhan. There aren’t so many people in the kingdom of Rama. There is just the one religion there. Here, there is the influence of evil spirits over everyone; there are the evil spirits of anger, greed and attachment. You forget that you are imperishable and that bodies are perishable. You don’t become soul conscious at all; there is a lot of body consciousness. There is the difference of day and night between body consciousness and soul consciousness. Soul-conscious deities become the masters of the whole world. By becoming body conscious, they have become poverty-stricken. Bharat was the Golden Sparrow. They speak of this, but they don’t understand the meaning of it. Shiv Baba comes to make your intellects divine. The Father says: Sweetest children, I make you into the masters of the world. This Lakshmi and Narayan were the masters of the world. Did you ever hear who gave them their kingdom? What deeds did they perform that they claimed such a high status? It is a matter of karma. When people perform devilish deeds, those deeds are sinful. In the golden age, deeds are neutral. There is no account of karma there. The Father explains: Because of not understanding, people cause a lot of obstacles. They say that Shiva and Shankar are one and the same. However, they show Shiva alone as the incorporeal One whereas they show Shankar with Parvati, and so the activities of each are different. How can a Minister and the President be one and the same? The status of each is completely different. So, how could Shiva and Shankar be one and the same like they say? You know that those who are not going to become part of the community of Rama will not understand this. The devilish community will defame you and create obstacles because they have the five vices in them. The deities are completely viceless. They have such a high status. You now understand that you were so viceless. All are born through vice. Sannyasis too have to take birth through vice. Then they take up renunciation. These things do not exist in the golden age. Sannyasis do not understand the golden age. They say that the golden age exists all the time, just as they say that Krishna is present everywhere and that Radhe is present everywhere. There are so many opinions and innumerable religions. The divine directions which you are now receiving continue for half the cycle. You are the mouth-born creation of Brahma and you then become part of the clan of Vishnu and then the moon dynasty. Those two are called dynasties whereas “the Brahmin clan” is said. This cannot be called a dynasty; there is no kingdom here. Only you understand this. Only some amongst you, too understand this. Some don’t reform themselves at all. They have one evil spirit or another. There are the evil spirits of greed and anger. There are no evil spirits in the golden age. Deities exist in the golden age. They are very happy. It is the evil spirits that cause sorrow. The evil spirit of lust causes sorrow from its beginning through the middle to the end. You have to make a lot of effort here. This is not like going to your aunty’s home! The Father continues to tell you: If you consider yourselves to be brothers and sisters, there cannot be criminal vision. Courage is needed for everything. Some say: If you don’t want to get married, get out of this house! Therefore, courage is needed.You also have to check yourself. You children are becoming multimillion times fortunate. All of this is going to be destroyed. Everything is going to turn to dust. Some continue to move along with very good courage. Some have courage and then fail. The Father continues to explain every situation to you. However, if you don’t do anything, it is understood that you don’t have full yoga. The ancient Raj Yoga of Bharat is very well known. It is only through this yoga that you become the masters of the world. Study is a source of income. It is by studying that you claim a high status, numberwise. Even in the relationship of brother and sister the intellect causes mischief. This is why the Father takes you even higher than that: Consider yourselves to be souls. Also consider others to be brother souls. If we are all brothers, there cannot be any other vision. When you look at a body, there are criminal thoughts. The Father says: Children, may you be bodiless. May you be soul conscious. Consider yourselves to be souls. Souls are imperishable. Once you have played your part through a body, you then have to become detached from that body. Those actors complete their parts and change their costumes. You too now have to take off your old clothes and wear new ones. At this time, souls are tamopradhan and bodies are also tamopradhan. Tamopradhan souls cannot go into liberation. Only when they become pure can they go there. Impure souls cannot return home. It is a lie when they say that so-and-so merged into the brahm element. Not a single one can go there. It is as though a genealogical tree is created there; it remains there just like that. Only you Brahmin children know this. They have not mentioned the name of Brahmins at all in the Gita. That One explains that He enters the body of Prajapita Brahma. Therefore, adoption is surely needed. Those brahmins are vicious whereas you are viceless. While becoming viceless, you have to tolerate many assaults. By seeing the name and form, many have bad thoughts. Even with the relationship of brother and sister they fall. They then write: Baba, I have fallen; I have dirtied my face. The Father says: Wonderful! I said: Live as brother and sister and you then again act wrongly! There is then very severe punishment received for that. In fact, when someone does something bad, he is put in jail. The Bharat that I established was so pure that its very name was Shivalaya. None have this knowledge in them. All the scriptures etc. are the physical paraphernalia of the path of devotion. In the golden age, all are in salvation and this why they don’t need to make effort. Here, everyone is making effort for liberation and salvation because they are in degradation. They go to bathe in the Ganges, but would the water of the Ganges give them salvation? Would it make them pure? They don’t know anything at all. You, too, are numberwise. Some don’t understand this themselves and so what would they explain to others? This is why Baba doesn’t send them anywhere. You continue to sing: Baba, when You come, I will follow Your directions and become a deity. Deities reside in the golden and silver ages. Here, it is mostly the vice of lust that people are trapped in. They cannot stay without the vice of lust. It is as though they inherit that vice from their mother and father. Here, you are receiving your inheritance from Rama. You are receiving an inheritance of purity. There is no question of vice there. Devotees say that Krishna is God. You show him as someone who takes 84 births. Ah! but God is incorporeal. His name is Shiva. The Father explains to you so well. He also has mercy. He is merciful. You children are so good and sensible. You have a lot of splendour. Those who have the powers of knowledge and yoga in them attract others. Those who are well educated receive very good respect. Those who are uneducated don’t receive respect. You know that all are the devilish community at this time; they don’t understand anything at all. The contrast between Shiva and Shankar is absolutely clear. That One is in the incorporeal world and this one is in the subtle region. How can both be the same? This is the tamopradhan world. Ravan is the enemy who belongs to the devilish community and he makes you the same as himself. The Father is now making you the same as Himself and then makes you belong to the deity community. Ravan doesn’t exist there. He stays burnt for half the cycle. The kingdom of Rama exists in the golden age. Gandhiji wanted the kingdom of Rama, but how could he establish the kingdom of Rama? He didn’t give teachings for anyone to become soul conscious. Only the Father says at the confluence age: May you be soul conscious! This is the age for becoming elevated. The Father continues to explain to you with so much love. You should repeatedly remember the Father with so much love: Baba, it is Your wonder! We had such stone intellects and You are now making us so elevated. We will only follow Your directions; we will not follow the directions of anyone else. At the end, everyone will say: The Brahma Kumars and Kumaris are following divine directions. Baba tells you such good things. He gives you the introduction of the beginning, the middle and the end and also reforms your character. Achcha. To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children. Essence for Dharna: 1. In order to make your vision pure and clean, do not look at the name and form of anyone.Practise becoming bodiless. Consider yourself to be a soul and speak to your brother soul. 2. In order to receive respect from everyone, imbibe the powers of knowledge and yoga. Become full of divine virtues. Do service by improving your character. Blessing: May you be free from laziness and carelessness and fulfil the responsibility of world benefit with zeal and enthusiasm. Whether you are new or old, to be a Brahmin means to take responsibility for world benefit. Whenever you have a responsibility, you fulfil it quickly, but when you have no responsibility, you become careless. Responsibility finishes laziness and carelessness. Those who have zeal and enthusiasm are tireless: they continue to increase the zeal and enthusiasm of others through their own faces and activities. Slogan: To use the powers according to the time means to be a knowledgeable and a yogi soul. #english #Murli #brahmakumaris #bkmurlitoday
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