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रूप तुम्हारा निराकार

𝐏𝐨𝐞𝐭: BK Mukesh Modi

विकारों का त्याग करो, समझो इन्हें जहर समान
दया धर्म को अपनाओ, समझाते हैं खुद भगवान

सन्तोष, सरलता, सत्यता, हो जीवन का आधार
पान करो दिव्य गुणों का, समझकर अमृत धार

पंच तत्वों से परे अपने, चैतन्य रूप को पहचानो
सुख शांति इसमें पाओगे, ये बात ईश्वर की मानो

निर्लिप्त और साक्षी भाव, अपने मन में जगाओ
आत्म स्मृति में रहकर, हर बंधन से मुक्ति पाओ

अहंकार रूपी महासर्प, कहीं डस तुम्हें ना जाए
स्वयं को कर्ता समझने का, भाव कभी ना आए

यदि हमेशा चाहते हो, अविनाशी सुख तुम पाना
अपने मन बुद्धि को, अज्ञान वन में ना भटकाना

माया की हर चाल, गहराई को पहचानते जाओ
किसी भी दैहिक बंधन में, खुद को ना फंसाओ

स्वयं को साक्षी, मुक्त और इच्छा रहित बनाओ
संसार के हर भ्रमजाल से, खुद को तुम छुड़ाओ

खुद को शरीर समझकर, बंधन में फंसते आए
मोहजाल में फंसकर तुम, रोते और रुलाते आए

बुद्धि रूपी हाथ में थामो, अब ज्ञान की तलवार
बंधन की डोर काटो, करके इस पर ठोस प्रहार

जन्म मरण पर मोह शोक, देह के धर्म कहलाते
यही देह के धर्म तुम्हें, दुनिया के बंधन में लाते

असत्य उसे समझो जिसने, पाया रूप साकार
सदा है अविनाशी केवल, रूप तुम्हारा निराकार ||

" ॐ शांति "

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