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पुरुषार्थ के प्रति सावधानी

𝐏𝐨𝐞𝐭: BK Mukesh Modi

अपने पुरुषार्थ पर न करना, इतना भी अभिमान
देहाभिमान हार न खिला दे, अकाले मृत्यु समान

बस एक पल की गलती से, माया जाती है जीत
बुद्धि पलटकर तुड़वा देती, बाबा से हमारी प्रीत

छा जाते बुद्धि के समक्ष, अज्ञान के बादल काले
संभल न पाता कोई, कितना भी खुद को संभाले

भिन्न भिन्न रूपों से, मायावी आकर्षण ललचाता
भौतिकता का रंग रूप, अपने जाल में फंसाता

अलबेलापन कर देता, पुरुषार्थ को ढ़ीला इतना
सोते अज्ञान निद्रा में, कुम्भकर्ण सोता है जितना

काम क्रोध से बन जाता, चेहरा पिला और लाल
चरित्रहीन बनाकर बिगाड़ देता, चलन और चाल

अपनाओ वो युक्ति, जो इस चक्रव्यूह से निकलें
बाबा की श्रीमत अपनाकर, खुद को पूरा बदलें

घर जाने का संकल्प, हमारे मन में चलता जाए
देह अभिमान का संकल्प, हमें नीचे न ले आए

सारे दिन जो खेला हमने, पाप पुण्य का खेल
सोने से पहले बाबा को, देना उनका पोता मेल

बाबा को चार्ट सुनाकर, बुद्धि से हल्के हो जाना
दोहराएंगे न विकर्म कोई, कसम बाबा से खाना

अकाल तख्त नशीन का, रोज अभ्यास बढ़ाना
ज्ञान गुण शक्तियों का, संचय मन में करते जाना

देवी गुण धारण कर, स्थापना की करना तैयारी
रावण को जीतने की, सीखते रहना होशियारी

मन बुद्धि में भरते जाना, शुद्ध ज्ञान का पेट्रोल
तभी सहज कर पाओगे, व्यर्थ पर तुम कण्ट्रोल

हर किसी भी बात पर, क्वेश्चन मार्क न लगाना
व्यर्थ सोचकर बुद्धि को, कभी भारी न बनाना

एक रस अवस्था से, करते जाना अपना सुधार
अशरीरीपन के अभ्यास से, होगा अपना उद्धार ||

" ॐ शांति "

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