
दशहरे का त्यौंहार
𝐏𝐨𝐞𝐭: BK Mukesh Modi
कागज के रावण फूंकने से, ये रावण ना मरेगा
जिंदा ये रहेगा जब तक, विकारों को ना हरेगा
पांच विकारों ने कब से, जीवन में डेरा जमाया
हर जन्म ये दुखी करते, ये जान ना कोई पाया
और ना कोई रावण, रूप ये पांच विकारों का
यही उजाड़ता जीवन, लाखों और हजारों का
आज तुम्हें ये कहता, हर विकार का परिणाम
छोड़ दो इन विकारों को, करूं मैं तुम्हें प्रणाम
पाप अभी कर रहे, समय तुम्हारा भी आएगा
ऊपरवाला खुद ही तुम्हें, आईना दिखलाएगा
छोटा सा भी पाप तुम्हारा, पीछा नहीं छोड़ेगा
पूरे खेल को पलटकर, घमण्ड तुम्हारा तोड़ेगा
हर विकार का पौधा, मन में कांटे ही उगाएगा
तेरा पाला हुआ सांप, तुझको ही डस जाएगा
अवगुण अनेक भरे तुझ में, कर ले ये स्वीकार
दिव्य गुण धारण करके, भीतर का रावण मार
अन्तर्मन में दसियों विकार, कर दे सबको नष्ट
मन के दाग़ मिटाकर सारे, चरित्र बना सुस्पष्ट
जिस दिन स्वच्छ कर लेगा, अपना हर संस्कार
सच्चे अर्थों में मना पाएगा, दशहरे का त्यौंहार ||
" ॐ शान्ति "
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