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बन गया मैं भी ब्रह्माकुमार

𝐏𝐨𝐞𝐭: BK Mukesh Modi

घूंट बड़े ही कड़वे कड़वे, जीवन भर पीता आया
जो चाहा वो हुआ नहीं, जो ना चाहा होता आया

शांत रहा ना इक पल भी, मन मेरा रहा भटकता
अपना ही स्वभाव सदा, लोगों को रहा खटकता

कर्म व्यवहार के खेल में, चलाई बहुत होशियारी
फिर भी ना जाने मुझसे, मेरी किस्मत क्यों हारी

सोचा नहीं था ऐसा होगा, मेरे जीवन का अंजाम
हो ना पाएगा खुद मेरा ही, जीवन जीना आसान

किसकी सलाह मानूँ, और सुनूँ मैं किसकी बात
इसी विचार में गुजरते गए, सुबह शाम दिन रात

भ्रमण करते हुए एक दिन, मिले श्वेत वस्त्र धारी
देखा मुझे उन्होंने और, दृष्टि पड़ी उन पर हमारी

उस्तुकता मन में लेकर, पहुंचा जब उनके करीब
उनको देखकर लगा, अब तो जागेगा मेरा नसीब

आदर और सम्मान से, उन्होंने पास मुझे बिठाया
मेरा ही परिचय उन्होंने, स्वयं मुझको ही बताया

आश्चर्य हुआ सुनकर, ऐसा ख्याल क्यों ना आया
कौन हूँ मैं कहाँ का वासी, सहज मुझे बतलाया

उन फरिश्तों के कहने पर, मैं सेवा केन्द्र में आया
आत्मा परमात्मा का असली, परिचय वहाँ पाया

शुरू हुई फिर ज्ञान योग की, हर रोज मेरी पढ़ाई
मिटने लगी निराशा, और चेहरे पर मुस्कान छाई

ज्ञान योग के पथ पर अब, बढ़ने लगा हूँ निरन्तर
मुझमें और बाबा में, खत्म होने लगे सभी अन्तर

सदा जोड़कर रखता हूँ मैं, बाबा से मन की तार
खुद को रोज बदलकर, बदलता जाऊँ मैं संसार

श्रेष्ठ कर्म करता ही जाऊँ, मैं रखकर शुद्ध विचार
श्वेत वस्त्र धारण कर, बन गया मैं भी ब्रह्माकुमार ||

" ॐ शांति "

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