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बाँधेली का सौभाग्य
𝐏𝐨𝐞𝐭: BK Mukesh Modi
लौकिक बन्धन की डोरी का, खेल बड़ा निराला
कड़ा बन्धन होकर भी, ये बाप से जोड़ने वाला
बाँधेली हो या बाँधेला, सभी कर्म बन्धन चुकाते
झूम झूमकर अपने बाबा की, यादों के गीत गाते
दिखता नहीं वो नयनों से, किंतु याद सदा आता
उसी की याद में गोपियों का, समय गुजर जाता
घर गृहस्थी में रहकर जो, खुद को पवित्र बनाते
अतीन्द्रिय सुख में रहकर, वो सेवा का फल पाते
भाग्यवान बनाने वाले, इस जीवन की बलिहारी
विकारी कुल की मर्यादाएं, भस्म हुई इसमें सारी
परमात्मा की आज्ञा पर, खुद को पावन बनाया
इक्कीस जन्म का सौभाग्य, हर बाँधेली ने पाया ||
" ॐ शांति "
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