
अनासक्त और नष्टोमोहा जीवन
𝐏𝐨𝐞𝐭: BK Mukesh Modi
भौतिकता को छोड़कर, मैं बनूंगा मस्त फकीर
ईश्वरीय प्यार पाकर, समझूंगा खुद को अमीर
स्वर्ग का प्रिंस बनूंगा मैं, कोई इच्छा ना पालूंगा
अपना हर आचरण, ईश्वरीय मर्यादा में ढ़ालूंगा
कलियुगी संसार की, सारी इच्छाएं मिटाऊंगा
हर इच्छा मिटाकर, बाबा को दिल में बसाऊंगा
अब कोई भी इच्छा, मेरे मन को नहीं सताएगी
मुझको अपने अधीन, कोई इच्छा नहीं बनाएगी
वस्तु व्यक्ति वैभव का, महसूस ना होगा अभाव
वरना ये अभाव बदलेगा, मेरा ही शुद्ध स्वभाव
वस्तु वैभव पाने की, यदि इच्छा यहाँ बढ़ाऊंगा
सतयुग का सर्वोच्च पद, उतना ही मैं गवाऊंगा
खान पान का आकर्षण, अगर मुझे लुभाएगा
एक पल में योगी से, भोगी भी मुझे बनाएगा
जो कुछ मुझे मिल जाए, खुश रहना है उसमें
हर हालात में रखना है, मन को अपने बस में
विनाशी इच्छाओं में यदि, बुद्धि को लगाऊंगा
माया को भी दबे पाँव, मैं आता हुआ पाऊंगा
अगर मुझे लुभाएगा, अपने ही तन का श्रंगार
आकर ही रहेंगे मेरे, जीवन में ये पाँच विकार
देहधारी का संग यदि, जरा भी मुझे लुभाएगा
जाने अनजाने मुझे, मोह की बन्दरी बनाएगा
हर विनाशी आकर्षण, अब खत्म करना होगा
सीधे सीधे बाप के दिल में, मुझे उतरना होगा
साधना के लिए छोडूंगा, मैं साधनों का आधार
बाप की श्रीमत पर करूंगा, अपना पूरा सुधार
अपने संकल्पों से मन को, बाबा से मैं जोड़ूँगा
पुराने जग के आकर्षण से, अपना मुख मोड़ूँगा
अब तो होकर रहूंगा मैं, सारे बंधनों से आजाद
न्यारा होकर लूंगा, अलौकिक जीवन का स्वाद
बाप की याद से मैं, हर आसक्ति को मिटाऊंगा
नष्टोमोहा बनकर उसकी, यादों में खो जाऊंगा ||
" ॐ शांति "
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