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अलौकिक रक्षा बंधन
𝐏𝐨𝐞𝐭: ब्रह्माकुमारीज़, माउंट आबू
आज अलौकिक रक्षा बंधन, वतन से बाबा लाए हैं
दिव्य गुणों का पावन कंगन, बाबा हमें पहनाए हैं।
दुःख-अशांति-भय-चिंता में, सारा जग चिल्ला रहा
निराश मायूस हो रहा, रक्षक नज़र ना आ रहा
देने सबको अभय-दान, प्रभु शरण में बुलाए हैं।
सोने की राखी बांधे पर, लगे ना रहे सोने में
बेशकीमती संगम को, कौड़ी बदले खोने में
रक्षा बंधन के बंधन, निर्बंधन हमें बनाए हैं।
बाबा कहते देर हो रही, अब ना देर लगाना है
सर्वशक्ति-संपन्न हो, संपूर्ण अब बन जाना है
अग्रिम दल के आदि रत्न, यही संदेश सुनाए हैं।
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