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ब्रह्मचर्य का व्रत महान
Book Description
ब्रह्मचर्य का व्रत लेना अर्थात काम विकार सहित अन्य सभी विकार (क्रोध, लोभ, मोह, देह भान का अहंकार, आदि) को छोड़ना और आजीवन अपने को ईश्वरीय संतान समज सभी को भाई-भाई , व भाई-बेहेन की दृस्टि से देखना।
जीवन में ब्रह्मचर्य का सबसे बड़ा महत्त्व है। पवित्रता ही आत्मा को बल (शक्ति) देती है। पवित्र बुद्धि को ही स्थिर बुद्धि मन जाता है। परमपिता परमात्मा शिव स्वयं कहते है: "पवित्रता की सभी गुणों की जननी है"
यह बुक जीवन में पवित्रता की उस शक्ति को पहचानने का आमंत्रण है, जो मनुष्य के विचारों, दृष्टि, वृत्ति, संबंधों और कर्मों को श्रेष्ठ दिशा प्रदान करती है। ब्रह्माकुमारीज़ की दृष्टि में ब्रह्मचर्य केवल शारीरिक संयम तक सीमित नहीं, बल्कि मन और बुद्धि को विकारों से मुक्त रखते हुए आत्म-चेतना में स्थित होने का अभ्यास है। जब विचार पवित्र होते हैं, तो वाणी और कर्मों में भी शांति, प्रेम और आध्यात्मिकता सहज रूप से प्रकट होने लगती है।
"पवित्रता ही आध्यात्मिक यात्रा की शक्ति और आधार है"... राजयोग, परमात्म-स्मृति और श्रेष्ठ संकल्पों के अभ्यास से आत्मा अपने मूल स्वरूप की शांति, प्रेम और पवित्रता को पुनः जागृत कर सकती है।
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