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स्वयं के भाग्य विधाता

𝐏𝐨𝐞𝐭: BK Mukesh Modi

परमपिता से हम सबने, अनमोल जीवन पाया
भाग्यशाली वो कहलाए, जिसे समझ ये आया

परमात्मा हम सबको, भाग्य की कलम थमाता
किंतू सबको अपना भाग्य, लिखना नहीं आता

बुद्धिबल सहित हम सबने, स्वस्थ तन भी पाया
अपना भाग्य लिखना, फिर क्यों हमें ना आया

उम्मीद करते रहते, कोई सहयोग हमें कर जाए
हमारा भाग्य लिखने, कोई और कलम चलाए

जो कोई जीवन में, एक यही ग़लती अपनाता
सदा के लिए उससे, भाग्य उसका रूठ जाता

मार हथौड़ों की खाकर, सोना जेवर बन जाता
मोल उतना बढ़े जितना, सुन्दर वो गढ़ा जाता

श्रेष्ठ कर्मों का पुरुषार्थी, स्वयं को तुम बनाओ
अपने भाग्य की रेखा, स्वयं ही खींचते जाओ

कर्मयोगी बनकर जब हम, कर्म करते जाएंगे
श्रेष्ठ भाग्य को अपने, द्वार पर उपस्थित पाएंगे ||

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