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मधुबन में आई "राखी की बहार"
𝐏𝐨𝐞𝐭: ब्रह्माकुमारीज़, माउंट आबू
मधुबन में राखी की आई है बहार
लाई सुख-सावन की शीतल फुहार
पावन-पावन पाये पवित्रता उपहार
झूमे-नाचे-गाये ब्राह्मणों का संसार।
प्यारे-प्यारे दो धागों में, दोनों ही जहान है
इनमें खुशी-उमंगों के, जमीं-आसमान हैं
प्यारे बाबा वतन से लाए, पावन रक्षा बंधन
मीठी-मीठी मर्यादाओं का, ये प्यारा कंगन
शक्तियों-वरदानों का, इसमें भरा भंडार।
हम स्व-रक्षक कुल-रक्षक, मर्यादा यज्ञ-रक्षक
राखी बांध के हमें बनाते, बाबा विश्व-रक्षक
प्रण करते हैं, प्राण जाए पर पवित्र हम रहेंगे
जी-जान से यज्ञ की, रक्षा करते रहेंगे
हमपे आप बलिहार बाबा, आप पे हम बलिहार।
चमकेंगे ये जब तक सूरज, चंदा और सितारे
नहीं टूटने देंगे बंधन, कहते मिलकर सारे।
बाबा-दादी-दीदियों के, प्यार की यही निशानी
स्वर्णिम युग स्वर्णिम भारत की, इसमें भरी कहानी
सबका रक्षक रक्षा बंधन, जिसकी महिमा अपरंपार।
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